भोजनालय के साधक मंगल प्रसाद जी
संघ के प्रचारक प्रायः स्वयंसेवक परिवारों में ही भोजन करते हैं; पर अब सभी बड़े कार्यालयों पर कई वृद्ध प्रचारक रहते हैं तथा प्रतिदिन बाहर से भी कार्यकर्ता आते रहते हैं। अतः स्थायी भोजनालय की व्यवस्था आवश्यक हो गयी है। इनका संचालन प्रायः वेतनभोगी लोग ही करते हैं; पर सब कार्यकर्ताओं के बीच वे परिवार के सदस्य की ही तरह रहते हैं।
नागपुर के केन्द्रीय कार्यालय पर भी 1952-53 तक यही स्थिति थी। श्री गुरुजी नागोबा गली में अपने माता-पिता के पास, जबकि शेष लोग एक छात्रावास में भोजन करते थे। ऐसे में कार्यालय प्रमुख श्री पांडुरंग पंत क्षीरसागर ने भोजनालय चलाने के लिए एक युवक मंगलप्रसाद को खोज निकाला। श्री गुरुजी की सहमति से समुचित मानदेय पर वे कार्यालय में आ गये।
मंगलप्रसाद जी म.प्र. में रीवा जिले में बंधुआ गांव के निवासी थे। उन दिनों नागपुर के होटल तथा छात्रावासों में रीवा के कई लोग काम करते थे। ऐसे लोग प्रायः मंगलप्रसाद जी से मिलने कार्यालय आते थे। विशाल हृदय वाले मंगलप्रसाद जी दुख-सुख में उनकी भली प्रकार चिन्ता करते थे। इस प्रकार धीरे-धीरे वे विशाल संघ परिवार के अभिन्न अंग बन गये।
कार्यालय के साथ ही संघ की विभिन्न बैठकों तथा शिविरों की व्यवस्था भी उनके जिम्मे ही रहती थी। संघ के किस वरिष्ठ कार्यकर्ता को कैसा भोजन चाहिए; किसे मधुमेह, रक्तचाप या हृदय रोग है और कौन मिर्च नहीं खाता, यह सब उन्हें याद रहता था। अतः वे उसी अनुसार व्यवस्था कर देते थे।
उन दिनों सभी केन्द्रीय बैठकें कार्यालय पर ही होती थीं। एक बार नागपुर के एक बाल शिविर में भीषण आंधी और वर्षा से तम्बू उखड़ गये, चारों ओर कीचड़ हो गया। ऐसे में भी उन्होंने समय से भोजन तैयार कर दिया।
मंगलप्रसाद जी कभी शाखा पर नहीं गये; पर एक निष्ठावान स्वयंसेवक जैसे सब गुण उनमें विद्यमान थे। भोजनालय ही उनकी साधनास्थली थी। 1975 के आपातकाल में अनेक प्रमुख कार्यकर्ता पकड़े गये, जबकि बाकी भूमिगत हो गये। संघ कार्यालय को भी पुलिस ने सील कर दिया। यद्यपि इससे पूर्व ही कार्यालय के महत्वपूर्ण कागज तथा सामान वहां से हटा दिया गया था।
भालचंद्र गोखले नामक कार्यकर्ता कार्यालय के पास वाले भूखंड पर रहने लगे। मंगलप्रसाद जी भी एक अन्य घर में काम करने लगे; पर वे प्रतिदिन दोपहर में वहां आते थे। इस प्रकार इन दोनों ने भूमिगत कार्यकर्ताओं के बीच सेतु बनकर संदेशों के आदान-प्रदान का क्रम बनाये रखा।
आपातकाल के बाद जब रेशीम बाग का आवासीय परिसर बन गया, तो ‘अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा’ तथा ‘केन्द्रीय कार्यकारी मंडल’ की बैठकें वहीं होने लगीं। वहां भोजनालय की व्यवस्था के लिए अलग टोली लगती थी, फिर भी सरकार्यवाह श्री शेषाद्रि जी उन्हें वहां अवश्य भेजते थे। उनके निर्देशन में ही सब काम होता था। इस प्रकार वे भोजनालय की पहचान बन गये।
अपने मधुर स्वभाव के कारण वे वयोवृद्ध से लेकर बाल और किशोर तक, सभी स्वयंसेवकों के प्रिय थे। उनकी कार्यनिष्ठा को देखकर नागपुर की एक सेवाभावी संस्था ने उन्हें ‘जीवननिष्ठा पुरस्कार’ से सम्मानित किया।
अधिक अवस्था होने पर वे अपने गांव चले गये। वे हृदयरोगी थे ही। संघ के कार्यकर्ताओं की देखरेख में प्रयाग में उनका इलाज चलता रहा। 12 अप्रैल, 2008 को अपने गांव बंधुआ में अपने परिजनों के बीच उनका देहांत हुआ। उनके अंतिम संस्कार में अखिल भारतीय शारीरिक प्रमुख श्री लक्ष्मण राव पार्डीकर ने उपस्थित होकर उन्हें श्रद्धांजलि दी।
संघ के प्रचारक प्रायः स्वयंसेवक परिवारों में ही भोजन करते हैं; पर अब सभी बड़े कार्यालयों पर कई वृद्ध प्रचारक रहते हैं तथा प्रतिदिन बाहर से भी कार्यकर्ता आते रहते हैं। अतः स्थायी भोजनालय की व्यवस्था आवश्यक हो गयी है। इनका संचालन प्रायः वेतनभोगी लोग ही करते हैं; पर सब कार्यकर्ताओं के बीच वे परिवार के सदस्य की ही तरह रहते हैं।
नागपुर के केन्द्रीय कार्यालय पर भी 1952-53 तक यही स्थिति थी। श्री गुरुजी नागोबा गली में अपने माता-पिता के पास, जबकि शेष लोग एक छात्रावास में भोजन करते थे। ऐसे में कार्यालय प्रमुख श्री पांडुरंग पंत क्षीरसागर ने भोजनालय चलाने के लिए एक युवक मंगलप्रसाद को खोज निकाला। श्री गुरुजी की सहमति से समुचित मानदेय पर वे कार्यालय में आ गये।
मंगलप्रसाद जी म.प्र. में रीवा जिले में बंधुआ गांव के निवासी थे। उन दिनों नागपुर के होटल तथा छात्रावासों में रीवा के कई लोग काम करते थे। ऐसे लोग प्रायः मंगलप्रसाद जी से मिलने कार्यालय आते थे। विशाल हृदय वाले मंगलप्रसाद जी दुख-सुख में उनकी भली प्रकार चिन्ता करते थे। इस प्रकार धीरे-धीरे वे विशाल संघ परिवार के अभिन्न अंग बन गये।
कार्यालय के साथ ही संघ की विभिन्न बैठकों तथा शिविरों की व्यवस्था भी उनके जिम्मे ही रहती थी। संघ के किस वरिष्ठ कार्यकर्ता को कैसा भोजन चाहिए; किसे मधुमेह, रक्तचाप या हृदय रोग है और कौन मिर्च नहीं खाता, यह सब उन्हें याद रहता था। अतः वे उसी अनुसार व्यवस्था कर देते थे।
उन दिनों सभी केन्द्रीय बैठकें कार्यालय पर ही होती थीं। एक बार नागपुर के एक बाल शिविर में भीषण आंधी और वर्षा से तम्बू उखड़ गये, चारों ओर कीचड़ हो गया। ऐसे में भी उन्होंने समय से भोजन तैयार कर दिया।
मंगलप्रसाद जी कभी शाखा पर नहीं गये; पर एक निष्ठावान स्वयंसेवक जैसे सब गुण उनमें विद्यमान थे। भोजनालय ही उनकी साधनास्थली थी। 1975 के आपातकाल में अनेक प्रमुख कार्यकर्ता पकड़े गये, जबकि बाकी भूमिगत हो गये। संघ कार्यालय को भी पुलिस ने सील कर दिया। यद्यपि इससे पूर्व ही कार्यालय के महत्वपूर्ण कागज तथा सामान वहां से हटा दिया गया था।
भालचंद्र गोखले नामक कार्यकर्ता कार्यालय के पास वाले भूखंड पर रहने लगे। मंगलप्रसाद जी भी एक अन्य घर में काम करने लगे; पर वे प्रतिदिन दोपहर में वहां आते थे। इस प्रकार इन दोनों ने भूमिगत कार्यकर्ताओं के बीच सेतु बनकर संदेशों के आदान-प्रदान का क्रम बनाये रखा।
आपातकाल के बाद जब रेशीम बाग का आवासीय परिसर बन गया, तो ‘अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा’ तथा ‘केन्द्रीय कार्यकारी मंडल’ की बैठकें वहीं होने लगीं। वहां भोजनालय की व्यवस्था के लिए अलग टोली लगती थी, फिर भी सरकार्यवाह श्री शेषाद्रि जी उन्हें वहां अवश्य भेजते थे। उनके निर्देशन में ही सब काम होता था। इस प्रकार वे भोजनालय की पहचान बन गये।
अपने मधुर स्वभाव के कारण वे वयोवृद्ध से लेकर बाल और किशोर तक, सभी स्वयंसेवकों के प्रिय थे। उनकी कार्यनिष्ठा को देखकर नागपुर की एक सेवाभावी संस्था ने उन्हें ‘जीवननिष्ठा पुरस्कार’ से सम्मानित किया।
अधिक अवस्था होने पर वे अपने गांव चले गये। वे हृदयरोगी थे ही। संघ के कार्यकर्ताओं की देखरेख में प्रयाग में उनका इलाज चलता रहा। 12 अप्रैल, 2008 को अपने गांव बंधुआ में अपने परिजनों के बीच उनका देहांत हुआ। उनके अंतिम संस्कार में अखिल भारतीय शारीरिक प्रमुख श्री लक्ष्मण राव पार्डीकर ने उपस्थित होकर उन्हें श्रद्धांजलि दी।
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