Followers

Saturday, 6 June 2020

श्रीमाधवरावगोलवलकर

संघ के संस्थापक डा. हेडगेवार ने अपने देहान्त से पूर्व जिनके समर्थ कन्धों पर संघ का भार सौंपा, वे थे श्रीमाधवरावगोलवलकर, जिन्हें सब प्रेम से श्री_गुरुजी कहकर पुकारते हैं। माधव का जन्म 19 फरवरी, 1906 (विजया एकादशी) को नागपुर में अपने मामा के घर हुआ था। उनके पिता सदाशिव गोलवलकर उन दिनों नागपुर से 70 कि.मी. दूर रामटेक में अध्यापक थे।
माधव बचपन से ही अत्यधिक मेधावी छात्र थे। उन्होंने सभी परीक्षाएँ सदा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण कीं। कक्षा में हर प्रश्न का उत्तर वे सबसे पहले दे देते थे। अतः उन पर यह प्रतिबन्ध लगा दिया गया कि जब कोई अन्य छात्र उत्तर नहीं दे पायेगा, तब ही वह बोलेंगे। एक बार उनके पास की कक्षा में गणित के एक प्रश्न का उत्तर जब किसी छात्र और अध्यापक को भी नहीं सूझा, तब माधव को बुलाकर वह प्रश्न हल किया गया।
वे अपने पाठ्यक्रम के अतिरिक्त अन्य पुस्तकें भी खूब पढ़ते थे। नागपुर के हिस्लाप क्रिश्चियन कॉलिज में प्रधानाचार्य गार्डिनर बाइबिल पढ़ाते थे। एक बार माधव ने उन्हें ही गलत अध्याय का उद्धरण देने पर टोक दिया। जब बाइबिल मँगाकर देखी गयी, तो माधव की बात ठीक थी। इसके अतिरिक्त हॉकी व टेनिस का खेल तथा सितार एवं बाँसुरीवादन भी माधव के प्रिय विषय थे।
उच्च शिक्षा के लिए काशी जाने पर उनका सम्पर्क संघ से हुआ। वे नियमित रूप से शाखा पर जाने लगे। जब डा. हेडगेवार काशी आये, तो उनसे वार्तालाप में माधव का संघ के प्रति विश्वास और दृढ़ हो गया। एम-एस.सी. करने के बाद वे शोधकार्य के लिए मद्रास गये; पर वहाँ का मौसम अनुकूल न आने के कारण वे काशी विश्वविद्यालय में ही प्राध्यापक बन गये।
उनके मधुर व्यवहार तथा पढ़ाने की अद्भुत शैली के कारण सब उन्हें ‘गुरुजी’ कहने लगे और फिर तो यही नाम उनकी पहचान बन गया। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के संस्थापक मालवीय जी भी उनसे बहुत प्रेम करते थे। कुछ समय काशी रहकर वे नागपुर आ गये और कानून की परीक्षा उत्तीर्ण की। उन दिनों उनका सम्पर्क रामकृष्ण मिशन से भी हुआ और वे एक दिन चुपचाप बंगाल के सारगाछी आश्रम चले गये। वहाँ उन्होंने विवेकानन्द के गुरुभाई स्वामी अखंडानन्द जी से दीक्षा ली।
स्वामी जी के देहान्त के बाद वे नागपुर लौट आये तथा फिर पूरी शक्ति से संघ कार्य में लग गये। उनकी योग्यता देखकर डा0 हेडगेवार ने उन्हें 1939_में_सरकार्यवाह का दायित्व दिया। अब पूरे देश में उनका प्रवास होने लगा। 21 जून, 1940 को डा. हेडगेवार के देहान्त के बाद गुरुजी सरसंघचालक बने। उन्होंने संघ कार्य को गति देने के लिए अपनी पूरी शक्ति झोंक दी।
1947 में देश आजाद हुआ; पर उसे विभाजन का दंश भी झेलना पड़ा। 1948 में गांधी जी हत्या का झूठा आरोप लगाकर संघ पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। गुरुजी को जेल में डाल दिया गया; पर उन्होंने धैर्य से सब समस्याओं को झेला और संघ तथा देश को सही दिशा दी। इससे सब ओर उनकी ख्याति फैल गयी। संघ-कार्य भी देश के हर जिले में पहुँच गया।
गुरुजी का धर्मग्रन्थों एवं हिन्दू दर्शन पर इतना अधिकार था कि एक बार शंकराचार्य पद के लिए उनका नाम प्रस्तावित किया गया था; पर उन्होंने विनम्रतापूर्वक उसे अस्वीकार कर दिया। 1970 में वे कैंसर से पीड़ित हो गये। शल्य चिकित्सा से कुछ लाभ तो हुआ; पर पूरी तरह नहीं। इसके बाद भी वे प्रवास करते रहे; पर शरीर का अपना कुछ धर्म होता है। उसे निभाते हुए श्री गुरुजी ने 5 जून, 1973 को रात्रि में शरीर छोड़ दिया।

Wednesday, 22 April 2020

BHAGAVA-PHALGHAR MURDER

भगव्याच्या हत्येत निळा,लाल रंग तर होताच पण मातोश्रीच्या भगव्या सोबत भानापतीचा रंग बदलणारा सरडा पण होता. ह्या सरड्याने, लाल रंग आणि निळ्या रंगाच्या आनंदापोटी, आपली पोळी शेकण्यासाठी, आपली मतपेटी राखून ठेवण्यासाठी, तुरूगांत असलेल्या नक्षलवाद्यांच्या समर्थकांची मर्जी ठेवण्यासाठी, मातोश्रीच्या भगव्या पण हिरव्या झालेल्या रंगाच्या मदतीने आलेली भगवी शिकार समजून, निरपराध भगव्याची हत्या केली. आपली राजाची गादी शाबूत ठेवण्यासाठी बापाने घातलेल्या भगव्या रंगाची हत्या करायलाही हा भगवा तयार झाला आणि त्या लाल, निळ्या, क्रिस्तीचे रोष नकोत म्हणुन, त्या भगव्या देहाची विटंबना देखील केली.
तुरूगांत असलेल्या नक्षलवाद्यांच्या समर्थनार्थ, आपला नक्षलवादी माणूस तुरूगांत डांबल्याने, त्यांच्या भागातील समर्थकांमध्ये भयंकर असंतोष तर होताच शिवाय त्यांचा दिल्लीतील राजावर असलेला भयंकर राग आणि हिंदुव्देष याचा मिलाप होवुन, समोर हयांना भगवा दिसला होता. भगवा दिसताच ही क्रुर, निर्दयी, हैवान माकडे संतापली होती. पण खाकीने मात्र थोडीशी दया दाखवुन, भगव्याला वाचविण्याच्या प्रयत्नात काही भ्रष्टवादी काँगी पक्षाच्या प्रमुखाला, लाल कम्युनिच प्रमुखांना बोलाविले, पण ह्यांना देखील, तिथे आपली जबरदस्त मतपेटी दिसली. मग तेथीलच भ्रष्टवादी प्रमुखाने वरपर्यंत फोन केला, तिथुन तो फोन साहेबांकडे आणि भगव्या मातोश्रीवर गेला. मग काय ?? आपल्या नक्षलवादी पाळलेल्या कुत्र्यांच्या समर्थकांचा रोष शांत करा, असा आदेश मिळाला.
त्यात मात्र खाकी काहीच करू शकत नव्हती, मग त्याच रक्षण करणारया खाकीने मात्र त्या भगव्याला त्या हैवानांच्या हवाली केले. आधीच पिसाळलेल्या त्या हैवानांनी आपली हैवानियत नकळत मिळालेल्या भगव्यावर काढुन आपला राग, व्देष तर नाही. पण तुरूगांत डांबलेल्या नक्षलवादी मालकांचा बदला मात्र ह्या शैतानानी घेतला, असेच तिथले ते हैवान मात्र बोलत होते.
त्या नक्षलवादी, क्रिस्ती समर्थकांना ऐवढा राग होता, की त्यांनी खाकीला सरळ चेतावणी दिली की, ह्या भगव्याला मरणोपरांत कुठलाच सन्मान द्यायचा नाही. खाकीचा मात्र इथे नाईलाज होता, खाकीने तसेच केले आणि वरून आलेल्या आदेशाचे पालन मात्र खाकीने मोठ्या खुबीने केले. त्या भगव्याच्या मरणोपरांतही मात्र देहांची विटंबणा करण्यात आली. खाकीला काही लाज लज्जा शिल्लक नव्हतीच, नाईलाज तर होताच,
पण गादी वाचविण्यासाठी स्वतः भगवा आहे सांगत, कधी हिरवा झाला हे कळलेही नाही, त्याने मात्र भगव्याच्या हत्येत आपली समर्थतता दर्शविली. त्याहुन कळसुत्री भानापतीचा राक्षस मात्र खुप आनंदीत होता. कारण त्याने एका दगडात दोन शिकार केले होते. एक तर त्या नक्षलवादी, लाल बावट्यांचे, निळयाचे शिवाय क्रिंस्तीची मतपेटी तर मिळविली, त्यांचा राग भगव्याची हत्या करून घालविला, त्यांचा राग तर गेला पण समर्थन मात्र मिळाला आणि दुसरे असे की भगव्याची हत्या करून आपल्या खासमखास माणसास त्याने खुष करून पुन्हा एकदा आपली वफादारी मात्र दाखवुन दिली.
तेथील त्या हैवानांना खुष केलेच, पण ही हैवानियत बाहेर पडू नये, म्हणुन कसोशिने प्रयत्न सुरू ठेवले. त्याला ऐवढेच हवे होते की, तेथील हैवानांना भगव्याच्या हत्येने आपण शांत केले, पण ही हैवानियत जगासमोर यायला नको, ह्याचे आटोकाट प्रयत्न केले. पण काही माणूसकी शिल्लक असलेल्या माणसांने मात्र माणूसकी दाखवित ही हैवानियत पुढे आणली आणि ती खाकी होती. हैवानियत जगासमोर येताना दिसताच मात्र मातोश्रीच्या हिरव्या रंगाने आणि भानापतीच्या डुक्कराने आपल्या राज्यातील दलाल बिडीयाला पैशे कोंबुन आणि प्रेश्या मुत्रकारांना गप्प राहण्यास सांगितले. राज्यातील बिडीया गप्प होती, पण हिंदी बिडीयाने मात्र ह्या भगव्या पण हिरव्या झालेल्या मातोश्रीच्या सत्तालंपटांचा चेहराच नागडा केला. पण अजुनही सत्यता बाहेर का येत नाही ? हेच मात्र त्या वाट लावलेल्या राज्यातील नागरीकांना मात्र समजत नाही आहे.
कुणाच्या रोषाला शांत करण्यासाठी जर ही निच सत्तालोलुप राजकारणी जर निरपराध भगव्याची हत्या करून, देहांची विटंबना करून, तुरूगांत डांबलेल्या आपल्या साथिदारांच्या बदल्यासाठी, आपल्या मतपेटीसाठी, आपली गादी अबाधित ठेवण्यासाठी जर हे माणसं जनावरे बनत असतील, तर काळ्या केसांच्या मनुष्याचे असित्वच नष्ट व्हायला हवे. हे भगवंता, संकटात जनावरेही साथ देतात, पण इथे संकटातही निरपराध लोकांची आपल्या स्वार्थासाठी, आपले हेतु साधण्यासाठी जर तुला मानणारया, तुला पुजणारया भगव्याची ही क्रुरतेने हत्या होवू द्या, असे आदेश देत असतील, तर हे माणसं नसुन हैवान आहेत हैवान.

Monday, 13 April 2020

भोजनालय के साधक मंगल प्रसाद जी

भोजनालय के साधक मंगल प्रसाद जी

संघ के प्रचारक प्रायः स्वयंसेवक परिवारों में ही भोजन करते हैं; पर अब सभी बड़े कार्यालयों पर कई वृद्ध प्रचारक रहते हैं तथा प्रतिदिन बाहर से भी कार्यकर्ता आते रहते हैं। अतः स्थायी भोजनालय की व्यवस्था आवश्यक हो गयी है। इनका संचालन प्रायः वेतनभोगी लोग ही करते हैं; पर सब कार्यकर्ताओं के बीच वे परिवार के सदस्य की ही तरह रहते हैं।

नागपुर के केन्द्रीय कार्यालय पर भी 1952-53 तक यही स्थिति थी। श्री गुरुजी नागोबा गली में अपने माता-पिता के पास, जबकि शेष लोग एक छात्रावास में भोजन करते थे। ऐसे में कार्यालय प्रमुख श्री पांडुरंग पंत क्षीरसागर ने भोजनालय चलाने के लिए एक युवक मंगलप्रसाद को खोज निकाला। श्री गुरुजी की सहमति से समुचित मानदेय पर वे कार्यालय में आ गये।

मंगलप्रसाद जी म.प्र. में रीवा जिले में बंधुआ गांव के निवासी थे। उन दिनों नागपुर के होटल तथा छात्रावासों में रीवा के कई लोग काम करते थे। ऐसे लोग प्रायः मंगलप्रसाद जी से मिलने कार्यालय आते थे। विशाल हृदय वाले मंगलप्रसाद जी दुख-सुख में उनकी भली प्रकार चिन्ता करते थे। इस प्रकार धीरे-धीरे वे विशाल संघ परिवार के अभिन्न अंग बन गये।

कार्यालय के साथ ही संघ की विभिन्न बैठकों तथा शिविरों की व्यवस्था भी उनके जिम्मे ही रहती थी। संघ के किस वरिष्ठ कार्यकर्ता को कैसा भोजन चाहिए; किसे मधुमेह, रक्तचाप या हृदय रोग है और कौन मिर्च नहीं खाता, यह सब उन्हें याद रहता था। अतः वे उसी अनुसार व्यवस्था कर देते थे।

उन दिनों सभी केन्द्रीय बैठकें कार्यालय पर ही होती थीं। एक बार नागपुर के एक बाल शिविर में भीषण आंधी और वर्षा से तम्बू उखड़ गये, चारों ओर कीचड़ हो गया। ऐसे में भी उन्होंने समय से भोजन तैयार कर दिया।

मंगलप्रसाद जी कभी शाखा पर नहीं गये; पर एक निष्ठावान स्वयंसेवक जैसे सब गुण उनमें विद्यमान थे। भोजनालय ही उनकी साधनास्थली थी। 1975 के आपातकाल में अनेक प्रमुख कार्यकर्ता पकड़े गये, जबकि बाकी भूमिगत हो गये। संघ कार्यालय को भी पुलिस ने सील कर दिया। यद्यपि इससे पूर्व ही कार्यालय के महत्वपूर्ण कागज तथा सामान वहां से हटा दिया गया था।

भालचंद्र गोखले नामक कार्यकर्ता कार्यालय के पास वाले भूखंड पर रहने लगे। मंगलप्रसाद जी भी एक अन्य घर में काम करने लगे; पर वे प्रतिदिन दोपहर में वहां आते थे। इस प्रकार इन दोनों ने भूमिगत कार्यकर्ताओं के बीच सेतु बनकर संदेशों के आदान-प्रदान का क्रम बनाये रखा।

आपातकाल के बाद जब रेशीम बाग का आवासीय परिसर बन गया, तो ‘अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा’ तथा ‘केन्द्रीय कार्यकारी मंडल’ की बैठकें वहीं होने लगीं। वहां भोजनालय की व्यवस्था के लिए अलग टोली लगती थी, फिर भी सरकार्यवाह श्री शेषाद्रि जी उन्हें वहां अवश्य भेजते थे। उनके निर्देशन में ही सब काम होता था। इस प्रकार वे भोजनालय की पहचान बन गये।

अपने मधुर स्वभाव के कारण वे वयोवृद्ध से लेकर बाल और किशोर तक, सभी स्वयंसेवकों के प्रिय थे। उनकी कार्यनिष्ठा को देखकर नागपुर की एक सेवाभावी संस्था ने उन्हें ‘जीवननिष्ठा पुरस्कार’ से सम्मानित किया।

अधिक अवस्था होने पर वे अपने गांव चले गये। वे हृदयरोगी थे ही। संघ के कार्यकर्ताओं की देखरेख में प्रयाग में उनका इलाज चलता रहा। 12 अप्रैल, 2008 को अपने गांव बंधुआ में अपने परिजनों के बीच उनका देहांत हुआ। उनके अंतिम संस्कार में अखिल भारतीय शारीरिक प्रमुख श्री लक्ष्मण राव पार्डीकर ने उपस्थित होकर उन्हें श्रद्धांजलि दी।

कुशल संगठक सुन्दर सिंह भण्डारी

कुशल संगठक सुन्दर सिंह भण्डारी

श्री सुन्दर सिंह भंडारी का जन्म 12 अप्रैल, 1921 को उदयपुर (राजस्थान) में प्रसिद्ध चिकित्सक डा. सुजानसिंह के घर में हुआ था। 1937-38 में कानपुर में बी.ए. करते समय वे अपने सहपाठी दीनदयाल उपाध्याय के साथ नवाबगंज शाखा पर जाने लगे। भाऊराव देवरस से भी इनकी घनिष्ठता थी।

1940 में नागपुर से प्रथम वर्ष का संघ शिक्षा वर्ग करते समय इन्हें डा0 हेडगेवार के दर्शन का सौभाग्य मिला। 1946 में तृतीय वर्ष कर भंडारी जी प्रचारक बन गये। सर्वप्रथम इन्हें जोधपुर विभाग का काम दिया गया। 1948 के प्रतिबंध काल में भूमिगत रहकर इन्होंने सत्याग्रह का संचालन किया।

1951 में डा. श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने ‘भारतीय जनसंघ’ की स्थापना कर श्री गुरुजी से कुछ कार्यकर्ताओं की मांग की। उनके आग्रह पर दीनदयाल उपाध्याय और नानाजी देशमुख के साथ भंडारी जी को भी इसमें भेज दिया गया।

प्रारम्भ में वे राजस्थान में ही जनसंघ के संगठन मन्त्री रहे। उनके प्रयास से 1952 के चुनाव में राजस्थान से जनसंघ के आठ विधायक जीते। बहुत शीघ्र ही जनसंघ का काम गांव-गांव में फैल गया। वे अति साहसी एवं स्थिरमति के व्यक्ति थे। कश्मीर सत्याग्रह के दौरान 23 जून, 1953 को डा0 मुखर्जी की जेल में ही षड्यन्त्रपूर्वक हत्या कर दी गयी; पर भंडारी जी ने उसी दिन स्वयं को एक सत्याग्रही जत्थे के साथ गिरफ्तारी के लिए प्रस्तुत कर दिया।

1954 में जनसंघ के केन्द्रीय मंत्री के नाते उन्होंने राजस्थान, गुजरात, हिमाचल तथा उ.प्र. में सघन कार्य किया। 1967 में दीनदयाल जी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने पर वे महामंत्री बनाये गये। 1968 में दीनदयाल जी की हत्या के बाद उन्हें जनसंघ का राष्ट्रीय संगठन मन्त्री बनाया गया।

वे संगठन के अनुशासन तथा रीति-नीति का कठोरता से पालन करते थे। निर्णय से पूर्व वे विचार-विमर्श का खुले मन से स्वागत करते थे; पर बाद में बोलने को अक्षम्य मानते थे। कई वर्ष संगठन मन्त्री रहने के बाद वे दल के उपाध्यक्ष बने। आपातकाल के विरुद्ध हुए संघर्ष में वे भूमिगत रहकर काम करते रहे; पर कुछ समय बाद वे पकड़े गये। जेल में उन्होंने अपनी सादगी और वैचारिक स्पष्टता से विरोधियों का मन भी जीत लिया। जेल से ही वे राज्यसभा के लिए निर्वाचित हुए।

1977 में जनता पार्टी में जनसंघ का विलय हुआ; पर यह मित्रता स्थायी नहीं रही। भंडारी जी को इसका अनुमान था। अतः उन्होंने पहले ही ‘युवा मोर्चा’ तथा ‘जनता विद्यार्थी मोर्चा’ का गठन कर लिया था। 1980 में ‘भारतीय जनता पार्टी’ का गठन होने पर नये दल का संविधान उन्हीं की देखरेख में बना।

दो बार उन्हें राजस्थान से राज्यसभा में भेजा गया। तीसरी बार उन्होंने यह कहकर मनाकर दिया कि अब किसी अन्य कार्यकर्ता को अवसर मिलना चाहिए; पर मा0 रज्जू भैया एवं शेषाद्रि जी के आग्रह पर वे उत्तर प्रदेश से राज्यसभा में जाने को तैयार हुए। केन्द्र में अटल जी के नेतृत्व में बनी सरकार में वे बिहार और गुजरात के राज्यपाल तथा ‘मानवाधिकार आयोग’ के अध्यक्ष रहे।

भंडारी जी ने आजीवन प्रचारक की मर्यादा को निभाया। वैचारिक संभ्रम की स्थिति में उनका परामर्श सदा काम आता था। वे बहुत कम बोलते थे; पर उनकी बात गोली की तरह अचूक होती थी। अटल जी तथा आडवाणी जी उनसे छोटे थे। अतः आवश्यकता होने पर वे उन्हें भी खरी-खरी सुना देते थे।

संघ, जनसंघ और भा.ज.पा. को अपने संगठन कौशल से सींचने वाले श्री सुंदर सिंह भंडारी का 84 वर्ष की सुदीर्घ आयु में 22 जून, 2005 को अति प्रातः नींद में हुए तीव्र हृदयाघात से देहान्त हो गया।