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Wednesday, 28 August 2024

28 अगस्त/जन्म-दिवस प्रथम प्रचारक : बाबासाहब आप्टे

  28 अगस्त/जन्म-दिवस

प्रथम प्रचारक   : बाबासाहब आप्टे


28 अगस्त, 1903 को यवतमाल, महाराष्ट्र के एक निर्धन परिवार में जन्मे उमाकान्त केशव आप्टे का प्रारम्भिक जीवन बड़ी कठिनाइयों में बीता। 16 वर्ष की छोटी अवस्था में पिता का देहान्त होने से परिवार की सारी जिम्मेदारी इन पर ही आ गयी।


इन्हें पुस्तक पढ़ने का बहुत शौक था। आठ वर्ष की अवस्था में इनके मामा ‘ईसप की कथाएँ’ नामक पुस्तक लेकर आये। उमाकान्त देर रात तक उसे पढ़ता रहा। केवल चार घण्टे सोकर उसने फिर पढ़ना शुरू कर दिया। मामा जी अगले दिन वापस जाने वाले थे। अतः उमाकान्त खाना-पीना भूलकर पढ़ने में लगे रहे। खाने के लिए माँ के बुलाने पर भी वह नहीं आया, तो पिताजी छड़ी लेकर आ गये। इस पर उमाकान्त अपनी पीठ उघाड़कर बैठ गया। बोला - आप चाहे जितना मार लें; पर इसेे पढ़े बिना मैं अन्न-जल ग्रहण नहीं करूँगा। उसके हठ के सामने सबको झुकना पड़ा।


छात्र जीवन में वे लोकमान्य तिलक से बहुत प्रभावित थे। एक बार तिलक जी रेल से उधर से गुजरने वाले थे। प्रधानाचार्य नहीं चाहते थे कि विद्यार्थी उनके दर्शन करने जाएँ। अतः उन्होंने फाटक बन्द करा दिया। विद्यालय का समय समाप्त होने पर उमाकान्त ने जाना चाहा; पर अध्यापक ने जाने नहीं दिया। जिद करने पर अध्यापक ने छड़ी से उनकी पिटाई कर दी।


इसी बीच रेल चली गयी। अब अध्यापक ने सबको छोड़ दिया। उमाकान्त ने गुस्से में कहा कि आपने भले ही मुझे नहीं जाने दिया; पर मैंने मन ही मन तिलक जी के दर्शन कर लिये हैं और उनके आदेशानुसार अपना पूरा जीवन देश को अर्पित करने का निश्चय भी कर लिया है। अध्यापक अपना सिर पीटकर रह गये।


मैट्रिक करने के बाद घर की स्थिति को देखकर उन्होंने कुछ समय धामण गाँव में अध्यापन कार्य किया; पर पढ़ाते समय वे हर घटना को राष्ट्रवादी पुट देते रहते थे। एक बार उन्होंने विद्यालय में तिलक जयन्ती मनाई। इससे प्रधानाचार्य बहुत नाराज हुए। इस पर आप्टे जी ने त्यागपत्र दे दिया तथा नागपुर आकर एक प्रेस में काम करने लगे। इसी समय उनका परिचय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डा. हेडगेवार से हुआ। बस फिर क्या था, आप्टे जी क्रमशः संघ के लिए समर्पित होते चले गये।


पुस्तकों के प्रति उनकी लगन के कारण डा. हेडगेवार उन्हें ‘अक्षर शत्रु’ कहते थे। आप्टे जी ने हाथ से लिखकर दासबोध तथा टाइप कर वीर सावरकर की प्रतिबन्धित पुस्तक ‘सन 1857 का स्वाधीनता संग्राम’ अनेक नवयुवकों को पढ़ने को उपलब्ध करायीं। उन्होंने अनेक स्थानों पर नौकरी की; पर नौकरी के अतिरिक्त शेष समय वे संघ कार्य में लगाते थे।


संघ कार्य के लिए अब उन्हें नागपुर से बाहर भी प्रवास करना पड़ता था। अतः उन्होंने नौकरी छोड़ दी और पूरा समय संघ के लिए लगाने लगे। इस प्रकार वे संघ के प्रथम प्रचारक बने। आगे चलकर डा0 जी उन्हें देश के अन्य भागों में भी भेजने लगे। इस प्रकार वे संघ के अघोषित प्रचार प्रमुख हो गये।


उनकी अध्ययनशीलता, परिश्रम, स्वाभाविक प्रौढ़ता तथा बातचीत की निराली शैली के कारण डा. जी ने उन्हें ‘बाबासाहब’ नाम दिया था। दशावतार जैसी प्राचीन कथाओं को आधुनिक सन्दर्भों में सुनाने की उनकी शैली अद्भुत थी। संघ में अनेक दायित्वों को निभाते हुए बाबासाहब आप्टे 27 जुलाई, 1972 (गुरुपूर्णिमा) को दिवंगत हो गये।

Saturday, 20 July 2024

गुरु पूर्णिमा (दिनांक 21-7-24, रविवार)

 गुरु पूर्णिमा 

(दिनांक 21-7-24, रविवार)

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*सनातन वैदिक हिंदू धर्म एवं भारतीय (हिंदू) संस्कृति में गुरु पूर्णिमा का महत्त्व* जिसमें

*त्याग, शौर्य, सूर्य तेज तथा समर्पण का भाव है।*

*गुरु भगवा ध्वज है एवं हम सब उसके शिष्य।*


_*स्वयंसेवक और गुरुपूजन उत्सव*_


*मैं वर्षभर स्वयं को संघ का स्वयंसेवक कहता हूं, समाज में संघ की बात भी करता हूं, गणवेश भी पहनता हूं, शाखा भी कभी-कभी जाता हूं।*


*समाज के लोगों को स्वयंसेवक बनने के लिए प्रेरित भी करता हूं, जब प्रचारकजी या बड़े भाई साहब आते हैं तो उनको बताता हूं या शाखा में परिचय देते समय बताता हूं कि मैं इतने वर्षों से स्वयंसेवक हूं।*


*'स्टेटस' में अपने गणवेश वाली फोटो भी लगाता हूं, संघ के देशभक्ति गीत व कविताएं, बोध कथाओं के 'स्टेट्स' व प्रचार प्रसार भी करता हूं और परिचय में अपना परिचय देता हूं कि _"मैंने प्राथमिक वर्ग किया है,  मैंने प्रथम वर्ष किया है।"_*

*परम पवित्र भगवा ध्वज को अपना गुरु भी बताता हूं। क्योंकि ये त्याग समर्पण का प्रतीक भी है।*


लेकिन

क्या मैंने वर्ष भर में एक बार आने वाले संघ के _महत्त्वपूर्ण उत्सव_ *गुरु पूजन* व *गुरू दक्षिणा* कार्यक्रम में समर्पण किया?

नहीं किया। *तो फिर मेरा स्वयंसेवक होने का अर्थ ही क्या जब मैंने अपने गुरु की पूजा नहीं की, गुरु को समर्पण नहीं किया।*


*समर्पण का अर्थ _केवल धन, रुपये से नहीं है;_ हम अपने गुरु को समय का भी समर्पण कर सकते हैं, मन का भी समर्पण कर सकते हैं। आत्म भाव का पुष्प या फूल भी चढ़ा सकते हैं।* लेकिन 

*एक स्वयंसेवक का गुरु पूजन होना बहुत ही आवश्यक है।*


*दायित्ववान कार्यकर्ता एवं सक्रिय स्वयंसेवकों का व पुराने स्वयंसेवक कार्यकर्ताओं का भी दायित्व बनता है।*


*सोचिए मैं दायित्ववान स्वयंसेवक हूं।* लेकिन मैं प्रचारकजी/कार्यवाहजी के फोन की राह देख रहा हूं? कि

वह फोन करके मुझे बोले कि *अपनी शाखा व अपने आस पास लगने वाली शाखा पर गुरुपूजन उत्सव/गुरु दक्षिणा कार्यक्रम मनाना है।*

हो सकता है किसी कारण वश यह लोग व्यस्त हो या मुझे 'फोन' नहीं लगा हो, तो *_मैं स्वयं भी तो गुरु पूजन उत्सव का आयोजन कर सकता हूं।_*


जिस बस्ती, गांव, नगर में मैं रहता हूं वहां

*ऐसे भी स्वयंसेवक हैं जो आवश्यकतानुसार सक्रिय नहीं है, प्रतिदिन शाखा नही जाते, तो उनका गुरु पूजन कौन करवाएगा?*

*मैं ही तो हूं जो ऐसे स्वयंसेवकों को सूचना देकर उनका शाखाओं पर गुरु पूजन करवाऊँगा।*

*अगर ऐसे स्वयंसेवकों का गुरु पूजन नहीं हो पाता तो मैं भी उसका दोषी हूं, क्योंकि समय रहते मैंने अपने ग्राम बस्ती नगर, उपखंड, मंडल में गुरु पूजन उत्सव का आयोजन नहीं किया और विभिन्न स्वयं सेवकों को सूचना नहीं दी।*


*अभी भी समय है;*

_गुरु पूजन के लिए, मैं उठूंगा, घर से निकलूंगा, स्वयंसेवकों को सूचना दूंगा और उनका गुरु पूजन अवश्य करवाऊंगा।_

*तब मैं सही स्वयंसेवक कहलाऊंगा।*


वर्षभर में होने वाली गुरु दक्षिणा गुरु/पूजन कार्यक्रम से ही

*पुरे एक वर्ष का कार्यालय व प्रचारकों का तथा शिविर वर्ग तथा उत्सवों एवं अन्य आयामों गतिविधियों के लिए यह सारा धनराशि खर्च होता है।*


_असामयिक मृत्यु को झेलने वाले केरल तथा बंगाल के स्वयंसेवक कार्यकर्ता बन्धुओं के परिवारों का खर्चा भी इसी से चलता है।_

*_प्रत्येक स्वयंसेवक को गुरु दक्षिणा समर्पण करनी चाहिए।_* 


*जिन-जिन व्यक्तियो ने संघ (RSS) की शाखा में व किसी भी कार्यक्रम/उत्सवो में एक बार भी ध्वज प्रणाम कर लिया वह व्यक्ति आजीवन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का घटक अंग समाजसेवी, यानि संघ का कार्यकर्ता, स्वयंसेवक बन जाता है।*


*हिंदू राष्ट्र के प्रतीक आराध्य गुरु _भगवा ध्वज_ सदा फहराता रहे।*


*भारत माता की जय*

*वंदे मातरम्*


~भवदीय 

*एक स्वयंसेवक*

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Tuesday, 2 July 2024

*परम् पूज्य रज्जू भैया जी🚩

 ⛳ *सुप्रभात🌞वन्दे मातरम्*⛳

🐌🪷🍁🐌🐄🐌🍁🪷

आषाढ़ मास, कृष्ण पक्ष, *द्वादशी*,

रोहिणी नक्षत्र, सूर्य उत्तरायण,

ग्रीष्म ऋतु, युगाब्ध ५१२६,

विक्रम संवत-२०८१,

बुधवार , 03 जुलाई 2024.

🚩~~~~~~~~~~~~~~~🚩

*_प्रभात दर्शन_ :-*

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*¶¶यह राष्ट्र हजारों वर्षों से हिंदू राष्ट्र है , हिंदू बनाना है नहीं है , स्थापित नहीं करना है , इसकी घोषणा भी नहीं करनी है , अपितु हिंदू राष्ट्र का सर्वांगीण विकास करना है। हिंदू अभी सुप्त अवस्था में है थक गया है , जब यह जागेगा तो ऐसी प्रदीप्त और तेजस्विता लेकर जागेगा की सारी दुनिया इसकी कर्मठता से प्रकाशित हो जाएगी¶¶*


   *परम् पूज्य रज्जू भैया जी🚩*

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*🚩आपका दिन मंगलमय हो🚩*

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            🙏🚩*


Friday, 21 June 2024

परम् पूoडॉo हेडगेवार जी🚩*

  ⛳ *सुप्रभात🌞वन्दे मातरम्*⛳

🐌🪷🍁🐌🐄🐌🍁🪷

ज्येष्ठ मास, शुक्ल पक्ष, *पूर्णिमा*,

पू.षा. नक्षत्र, सूर्य उत्तरायण,

ग्रीष्म ऋतु, युगाब्ध ५१२६,

विक्रम संवत-२०८१,

शनिवार, 22 जून 2024.

🚩~~~~~~~~~~~~~~~🚩

*_प्रभात दर्शन_ :-*

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*वयोवृद्ध लोगों का तो संघकार्य में काफी महत्त्व का स्थान है | वे संघ में महत्त्वपूर्ण कार्य का दायित्व उठा सकते हैं | यदि प्रौढ लोग अपनी प्रतिष्ठा तथा व्यवहार कुशलता का उपयोग संघकार्य के हेतु करें, तो युवकजन अधिकाधिक उत्साह से कार्य कर सकेंगे | बडों के मार्गदर्शन से युवकों की शक्ति कई गुना बढती है और तब संघकार्य अपने निश्चित ध्येय की ओर द्रुत गति से बढता चला जाता है | इसलिए किसी को भी संघ के प्रति उदासीनता नहीं रखनी चाहिए | प्रत्येक को उत्साह तथा हिम्मत से आगे आना चाहिए, कार्य में जुट जाना चाहिए|*

    *परम् पूoडॉo हेडगेवार जी🚩*

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*🚩आपका दिन मंगलमय हो🚩*

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          * 🙏🚩*



Thursday, 13 July 2023

Professor Rajendra Singh ( Rajju Bhaiya)

 राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के चतुर्थ सरसंघचालक प्रो. राजेन्द्र सिंह (रज्जू भैया)

पूण्य तिथि -14 जुलाई 2003



राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के चतुर्थ सरसंघचालक प्रो. राजेन्द्र सिंह का जन्म 29 जनवरी, 1922 को ग्राम बनैल (जिला बुलन्दशहर, उत्तर प्रदेश) के एक सम्पन्न एवं शिक्षित परिवार में हुआ था। उनके पिता कुँवर बलबीर सिंह अंग्रेज शासन में पहली बार बने भारतीय मुख्य अभियन्ता थे। इससे पूर्व इस पद पर सदा अंग्रेज ही नियुक्त होते थे। राजेन्द्र सिंह को घर में सब प्यार से रज्जू कहते थे। आगे चलकर उनका यही नाम सर्वत्र लोकप्रिय हुआ।


रज्जू भैया बचपन से ही बहुत मेधावी थे। उनके पिता की इच्छा थी कि वे प्रशासनिक सेवा में जायें। इसीलिए उन्हें पढ़ने के लिए प्रयाग भेजा गया; पर रज्जू भैया को अंग्रेजों की गुलामी पसन्द नहीं थी। उन्होंने प्रथम श्रेणी में एम-एस.सी. उत्तीर्ण की और फिर वहीं भौतिक विज्ञान के प्राध्यापक हो गये।


उनकी एम-एस.सी. की प्रयोगात्मक परीक्षा लेने नोबेल पुरस्कार विजेता डा. सी.वी.रमन आये थे। वे उनकी प्रतिभा से बहुत प्रभावित हुए तथा उन्हें अपने साथ बंगलौर चलकर शोध करने का आग्रह किया; पर रज्जू भैया के जीवन का लक्ष्य तो कुछ और ही था।


प्रयाग में उनका सम्पर्क संघ से हुआ और वे नियमित शाखा जाने लगे। संघ के तत्कालीन सरसंघचालक श्री गुरुजी से वे बहुत प्रभावित थे। 1943 में रज्जू भैया ने काशी से प्रथम वर्ष संघ शिक्षा वर्ग का प्रशिक्षण लिया। वहाँ श्री गुरुजी का ‘शिवाजी का पत्र, जयसिंह के नाम’ विषय पर जो बौद्धिक हुआ, उससे प्रेरित होकर उन्होंने अपना जीवन संघ कार्य हेतु समर्पित कर दिया। अब वे अध्यापन कार्य के अतिरिक्त शेष सारा समय संघ कार्य में लगाने लगे। उन्होंने घर में बता दिया कि वे विवाह के बन्धन में नहीं बधेंगे।


प्राध्यापक रहते हुए रज्जू भैया अब संघ कार्य के लिए अब पूरे उ.प्र.में प्रवास करने लगे। वे अपनी कक्षाओं का तालमेल ऐसे करते थे, जिससे छात्रों का अहित न हो तथा उन्हें सप्ताह में दो-तीन दिन प्रवास के लिए मिल जायें। पढ़ाने की रोचक शैली के कारण छात्र उनकी कक्षा के लिए उत्सुक रहते थे।


रज्जू भैया सादा जीवन उच्च विचार के समर्थक थे। वे सदा तृतीय श्रेणी में ही प्रवास करते थे तथा प्रवास का सारा व्यय अपनी जेब से करते थे। इसके बावजूद जो पैसा बचता था, उसे वे चुपचाप निर्धन छात्रों की फीस तथा पुस्तकों पर व्यय कर देते थे। 1966 में उन्होंने विश्वविद्यालय की नौकरी से त्यागपत्र दे दिया और पूरा समय संघ को ही देने लगे।


अब उन पर उत्तर प्रदेश के साथ बिहार का काम भी आ गया। वे एक अच्छे गायक भी थे। संघ शिक्षा वर्ग की गीत कक्षाओं में आकर गीत सीखने और सिखाने में उन्हें कोई संकोच नहीं होता था। सरल उदाहरणों से परिपूर्ण उनके बौद्धिक ऐसे होते थे, मानो कोई अध्यापक कक्षा ले रहा हो।


उनकी योग्यता के कारण उनका कार्यक्षेत्र क्रमशः बढ़ता गया। आपातकाल के समय भूमिगत संघर्ष को चलाये रखने में रज्जू भैया की बहुत बड़ी भूमिका थी। उन्होंने प्रोफेसर गौरव कुमार के छद्म नाम से देश भर में प्रवास किया। जेल में जाकर विपक्षी नेताओं से भेंट की और उन्हें एक मंच पर आकर चुनाव लड़ने को प्रेरित किया। इसी से इन्दिरा गांधी की तानाशाही का अन्त हुआ।


1977 में रज्जू भैया सह सरकार्यवाह, 1978 में सरकार्यवाह और 1994 में सरसंघचालक बने। उन्होंने देश भर में प्रवास कर स्वयंसेवकों को कार्य विस्तार की प्रेरणा दी। बीमारी के कारण उन्होंने 2000 ई0 में श्री सुदर्शन जी को यह दायित्व दे दिया। इसके बाद भी वे सभी कार्यक्रमों में जाते रहे।


अन्तिम समय तक सक्रिय रहते हुए 14 जुलाई, 2003 को कौशिक आश्रम, पुणे में रज्जू भैया का देहान्त हो गया।

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Saturday, 6 June 2020

श्रीमाधवरावगोलवलकर

संघ के संस्थापक डा. हेडगेवार ने अपने देहान्त से पूर्व जिनके समर्थ कन्धों पर संघ का भार सौंपा, वे थे श्रीमाधवरावगोलवलकर, जिन्हें सब प्रेम से श्री_गुरुजी कहकर पुकारते हैं। माधव का जन्म 19 फरवरी, 1906 (विजया एकादशी) को नागपुर में अपने मामा के घर हुआ था। उनके पिता सदाशिव गोलवलकर उन दिनों नागपुर से 70 कि.मी. दूर रामटेक में अध्यापक थे।
माधव बचपन से ही अत्यधिक मेधावी छात्र थे। उन्होंने सभी परीक्षाएँ सदा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण कीं। कक्षा में हर प्रश्न का उत्तर वे सबसे पहले दे देते थे। अतः उन पर यह प्रतिबन्ध लगा दिया गया कि जब कोई अन्य छात्र उत्तर नहीं दे पायेगा, तब ही वह बोलेंगे। एक बार उनके पास की कक्षा में गणित के एक प्रश्न का उत्तर जब किसी छात्र और अध्यापक को भी नहीं सूझा, तब माधव को बुलाकर वह प्रश्न हल किया गया।
वे अपने पाठ्यक्रम के अतिरिक्त अन्य पुस्तकें भी खूब पढ़ते थे। नागपुर के हिस्लाप क्रिश्चियन कॉलिज में प्रधानाचार्य गार्डिनर बाइबिल पढ़ाते थे। एक बार माधव ने उन्हें ही गलत अध्याय का उद्धरण देने पर टोक दिया। जब बाइबिल मँगाकर देखी गयी, तो माधव की बात ठीक थी। इसके अतिरिक्त हॉकी व टेनिस का खेल तथा सितार एवं बाँसुरीवादन भी माधव के प्रिय विषय थे।
उच्च शिक्षा के लिए काशी जाने पर उनका सम्पर्क संघ से हुआ। वे नियमित रूप से शाखा पर जाने लगे। जब डा. हेडगेवार काशी आये, तो उनसे वार्तालाप में माधव का संघ के प्रति विश्वास और दृढ़ हो गया। एम-एस.सी. करने के बाद वे शोधकार्य के लिए मद्रास गये; पर वहाँ का मौसम अनुकूल न आने के कारण वे काशी विश्वविद्यालय में ही प्राध्यापक बन गये।
उनके मधुर व्यवहार तथा पढ़ाने की अद्भुत शैली के कारण सब उन्हें ‘गुरुजी’ कहने लगे और फिर तो यही नाम उनकी पहचान बन गया। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के संस्थापक मालवीय जी भी उनसे बहुत प्रेम करते थे। कुछ समय काशी रहकर वे नागपुर आ गये और कानून की परीक्षा उत्तीर्ण की। उन दिनों उनका सम्पर्क रामकृष्ण मिशन से भी हुआ और वे एक दिन चुपचाप बंगाल के सारगाछी आश्रम चले गये। वहाँ उन्होंने विवेकानन्द के गुरुभाई स्वामी अखंडानन्द जी से दीक्षा ली।
स्वामी जी के देहान्त के बाद वे नागपुर लौट आये तथा फिर पूरी शक्ति से संघ कार्य में लग गये। उनकी योग्यता देखकर डा0 हेडगेवार ने उन्हें 1939_में_सरकार्यवाह का दायित्व दिया। अब पूरे देश में उनका प्रवास होने लगा। 21 जून, 1940 को डा. हेडगेवार के देहान्त के बाद गुरुजी सरसंघचालक बने। उन्होंने संघ कार्य को गति देने के लिए अपनी पूरी शक्ति झोंक दी।
1947 में देश आजाद हुआ; पर उसे विभाजन का दंश भी झेलना पड़ा। 1948 में गांधी जी हत्या का झूठा आरोप लगाकर संघ पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। गुरुजी को जेल में डाल दिया गया; पर उन्होंने धैर्य से सब समस्याओं को झेला और संघ तथा देश को सही दिशा दी। इससे सब ओर उनकी ख्याति फैल गयी। संघ-कार्य भी देश के हर जिले में पहुँच गया।
गुरुजी का धर्मग्रन्थों एवं हिन्दू दर्शन पर इतना अधिकार था कि एक बार शंकराचार्य पद के लिए उनका नाम प्रस्तावित किया गया था; पर उन्होंने विनम्रतापूर्वक उसे अस्वीकार कर दिया। 1970 में वे कैंसर से पीड़ित हो गये। शल्य चिकित्सा से कुछ लाभ तो हुआ; पर पूरी तरह नहीं। इसके बाद भी वे प्रवास करते रहे; पर शरीर का अपना कुछ धर्म होता है। उसे निभाते हुए श्री गुरुजी ने 5 जून, 1973 को रात्रि में शरीर छोड़ दिया।

Wednesday, 22 April 2020

BHAGAVA-PHALGHAR MURDER

भगव्याच्या हत्येत निळा,लाल रंग तर होताच पण मातोश्रीच्या भगव्या सोबत भानापतीचा रंग बदलणारा सरडा पण होता. ह्या सरड्याने, लाल रंग आणि निळ्या रंगाच्या आनंदापोटी, आपली पोळी शेकण्यासाठी, आपली मतपेटी राखून ठेवण्यासाठी, तुरूगांत असलेल्या नक्षलवाद्यांच्या समर्थकांची मर्जी ठेवण्यासाठी, मातोश्रीच्या भगव्या पण हिरव्या झालेल्या रंगाच्या मदतीने आलेली भगवी शिकार समजून, निरपराध भगव्याची हत्या केली. आपली राजाची गादी शाबूत ठेवण्यासाठी बापाने घातलेल्या भगव्या रंगाची हत्या करायलाही हा भगवा तयार झाला आणि त्या लाल, निळ्या, क्रिस्तीचे रोष नकोत म्हणुन, त्या भगव्या देहाची विटंबना देखील केली.
तुरूगांत असलेल्या नक्षलवाद्यांच्या समर्थनार्थ, आपला नक्षलवादी माणूस तुरूगांत डांबल्याने, त्यांच्या भागातील समर्थकांमध्ये भयंकर असंतोष तर होताच शिवाय त्यांचा दिल्लीतील राजावर असलेला भयंकर राग आणि हिंदुव्देष याचा मिलाप होवुन, समोर हयांना भगवा दिसला होता. भगवा दिसताच ही क्रुर, निर्दयी, हैवान माकडे संतापली होती. पण खाकीने मात्र थोडीशी दया दाखवुन, भगव्याला वाचविण्याच्या प्रयत्नात काही भ्रष्टवादी काँगी पक्षाच्या प्रमुखाला, लाल कम्युनिच प्रमुखांना बोलाविले, पण ह्यांना देखील, तिथे आपली जबरदस्त मतपेटी दिसली. मग तेथीलच भ्रष्टवादी प्रमुखाने वरपर्यंत फोन केला, तिथुन तो फोन साहेबांकडे आणि भगव्या मातोश्रीवर गेला. मग काय ?? आपल्या नक्षलवादी पाळलेल्या कुत्र्यांच्या समर्थकांचा रोष शांत करा, असा आदेश मिळाला.
त्यात मात्र खाकी काहीच करू शकत नव्हती, मग त्याच रक्षण करणारया खाकीने मात्र त्या भगव्याला त्या हैवानांच्या हवाली केले. आधीच पिसाळलेल्या त्या हैवानांनी आपली हैवानियत नकळत मिळालेल्या भगव्यावर काढुन आपला राग, व्देष तर नाही. पण तुरूगांत डांबलेल्या नक्षलवादी मालकांचा बदला मात्र ह्या शैतानानी घेतला, असेच तिथले ते हैवान मात्र बोलत होते.
त्या नक्षलवादी, क्रिस्ती समर्थकांना ऐवढा राग होता, की त्यांनी खाकीला सरळ चेतावणी दिली की, ह्या भगव्याला मरणोपरांत कुठलाच सन्मान द्यायचा नाही. खाकीचा मात्र इथे नाईलाज होता, खाकीने तसेच केले आणि वरून आलेल्या आदेशाचे पालन मात्र खाकीने मोठ्या खुबीने केले. त्या भगव्याच्या मरणोपरांतही मात्र देहांची विटंबणा करण्यात आली. खाकीला काही लाज लज्जा शिल्लक नव्हतीच, नाईलाज तर होताच,
पण गादी वाचविण्यासाठी स्वतः भगवा आहे सांगत, कधी हिरवा झाला हे कळलेही नाही, त्याने मात्र भगव्याच्या हत्येत आपली समर्थतता दर्शविली. त्याहुन कळसुत्री भानापतीचा राक्षस मात्र खुप आनंदीत होता. कारण त्याने एका दगडात दोन शिकार केले होते. एक तर त्या नक्षलवादी, लाल बावट्यांचे, निळयाचे शिवाय क्रिंस्तीची मतपेटी तर मिळविली, त्यांचा राग भगव्याची हत्या करून घालविला, त्यांचा राग तर गेला पण समर्थन मात्र मिळाला आणि दुसरे असे की भगव्याची हत्या करून आपल्या खासमखास माणसास त्याने खुष करून पुन्हा एकदा आपली वफादारी मात्र दाखवुन दिली.
तेथील त्या हैवानांना खुष केलेच, पण ही हैवानियत बाहेर पडू नये, म्हणुन कसोशिने प्रयत्न सुरू ठेवले. त्याला ऐवढेच हवे होते की, तेथील हैवानांना भगव्याच्या हत्येने आपण शांत केले, पण ही हैवानियत जगासमोर यायला नको, ह्याचे आटोकाट प्रयत्न केले. पण काही माणूसकी शिल्लक असलेल्या माणसांने मात्र माणूसकी दाखवित ही हैवानियत पुढे आणली आणि ती खाकी होती. हैवानियत जगासमोर येताना दिसताच मात्र मातोश्रीच्या हिरव्या रंगाने आणि भानापतीच्या डुक्कराने आपल्या राज्यातील दलाल बिडीयाला पैशे कोंबुन आणि प्रेश्या मुत्रकारांना गप्प राहण्यास सांगितले. राज्यातील बिडीया गप्प होती, पण हिंदी बिडीयाने मात्र ह्या भगव्या पण हिरव्या झालेल्या मातोश्रीच्या सत्तालंपटांचा चेहराच नागडा केला. पण अजुनही सत्यता बाहेर का येत नाही ? हेच मात्र त्या वाट लावलेल्या राज्यातील नागरीकांना मात्र समजत नाही आहे.
कुणाच्या रोषाला शांत करण्यासाठी जर ही निच सत्तालोलुप राजकारणी जर निरपराध भगव्याची हत्या करून, देहांची विटंबना करून, तुरूगांत डांबलेल्या आपल्या साथिदारांच्या बदल्यासाठी, आपल्या मतपेटीसाठी, आपली गादी अबाधित ठेवण्यासाठी जर हे माणसं जनावरे बनत असतील, तर काळ्या केसांच्या मनुष्याचे असित्वच नष्ट व्हायला हवे. हे भगवंता, संकटात जनावरेही साथ देतात, पण इथे संकटातही निरपराध लोकांची आपल्या स्वार्थासाठी, आपले हेतु साधण्यासाठी जर तुला मानणारया, तुला पुजणारया भगव्याची ही क्रुरतेने हत्या होवू द्या, असे आदेश देत असतील, तर हे माणसं नसुन हैवान आहेत हैवान.